दोस्ती……to my lost feelings of frnsp

जिस दोस्ती कि मिसाल
पेश किया करते थे लोग
वो अब बुझी मशाल सी
क्यों है
जिस जज्बे से रोशन
होती थी हमारी सुबह
वो जज्बा अब टिमटिमाते
जुगनू सा क्यों है

तुम्हारे हर दोस्त को अपना
दोस्त समझा हमने
फ़िर तुम्हारा ये जहां हमारे
दुश्मनो से बना क्यों है

दुख हमे ये न था के
तुमने हमे गैर समझा
दुख तो बस इतना सा है के
गैरों को तुमने अपना
कहा क्यों है

काश! एक बार भी जो
तुमने हमे समझा होता
तो हमसे ये शिकवा ना होता
के हमे तुमसे यूं
गिला क्यों है

दोस्त कह के हर एक ने
हमारे वजूद को नकारा है
फ़िर जो तुमने भी यूं आक्षेप किया
तो लगा के इसमें नया क्या है

ना जाने कितनी दुरी
साथ चले हम
कितनी गलियां यूंही
खाक छानी हमने
फ़िर आज एक ही कदम
साथ चलने मे
ये हिचक सी क्यों है

और तो और हि रहेंगे
जो कहना है उन्हें
वो कहते ही रहेंगे
हम उन्हे याद करने से
पहले ही भुल जाते हैं पर
दोस्त तेरी दोस्ती की यादें
मिट-२ के याद
आती सी क्यों है

अप्रैल 23, 2007 at 11:13 पूर्वाह्न 3 comments

क्या मुझे हक है?

मैं तेरे प्यार में तडपुं
क्या ये मुझे हक है
मैं इन आंखो की बारिश में भींगु
क्या ये मुझे हक है

दिल तो करता है के
मैं तुम्हे भुल ही जाउं,पर
क्या ये मुझे हक है

ये लब हर घडी तुम्हारी गुफ़्तगु ही चाहें
मैं तुम्हारी बातो को
 भुल भी जाउं पर
क्या ये मुझे हक है

कहने को तो कह ही देते हैं लोग
पर मैं तुमसे बेइंतिहा नफ़रत करुं
क्या ये मुझे हक है

जिंदगी जीने भी ना दे
मौत मरने भी ना दे तेरे बिना
जी करता है खत्म ही कर लुं खुद को,पर
क्या ये मुझे हक है

वक्त भी थम सा गया है
सांसे भी आधी अधूरी सी हैं
कोशिश करूं तो रोक भी लुं इन्हे, पर
क्या ये मुझे हक है

जीना तो पडेगा ही अब
ना अपने लिए,तुम्हारे लिए भी नही
औरों के लिए ही सही,पर
क्या ये मुझे हक है

इक हूक सी उठी है दिल में
इक ख्वाहिश सी बाकी है मुझमे
के काश एक बार और
तु मुझे समझे और मै तुम्हे समझुं,पर
क्या ये मुझे हक है

जमाने भर की उदासी को
अमानत की तरह पेश किया है मुझे तुमने
चाहता तो हुं के सहेज कर रखुं इन्हे,पर
क्या ये मुझे हक है

अप्रैल 16, 2007 at 10:54 अपराह्न 1 comment

chirharan..frnz it’s about the maasacre of a dalit family after rape of 4 ladies of dat family in a village in haryana

 है ध्रितराष्ट्र फ़िर आज बना आर्यावर्त का प्रहरी
फ़िर चोट लगी है आर्यावर्त के धर्मपुंज को गहरी

की थी भीष्म पितामह ने उस कुकर्म की पहरेदारी
आज भी भीष्मों कि है इस चीरहरण में एक मुक भागीदारी

एक कृष्णा के पुकार सुन के जो दौडे आये थे कृष्ण मुरारी
इतने कृष्णाओं के चीरहरण मे
क्या तुम्हारी भी है हिस्सेदारी

सतयुग में ही अनार्यत्व की
नीव पडी थी भारी

जब शंबूक के सत्य पे
राम के अंह्कार पडे भारी

आज फ़िर शंबूक के सत्य को
एक चोट पडी है करारी
अनार्य राम के अनार्य कुलों की
बन आयी है सारी

समय तुम साक्षी रहोगे इस अन्याय के
और ये मर्मांतक क्रंद्ण रहेगा जारी
जब तक कि आर्यत्व की
पुर्णजन्म नही होती पुरी

नवआर्यों इस चीरहरण की
तुम्हारी भी बनती है जिम्मेवारी
उठो आगे बडो
अनार्यों की इस आर्य देश से
विदाइ की है बारी

तुममें ही से किसी को
करनी होगी द्रौपदी के चीर की रक्षा
तुममे से ही किसी को
बनना होगा कॄष्ण मुरारी

है जो तुम्हारे रगो में
बहता एक आर्य लहु
लो भीम प्रतिञा, करो अर्जुन निश्च्य
कहो की पुरी है दुर्योधन के नाश की तैयारी

अप्रैल 8, 2007 at 3:27 अपराह्न 2 comments

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अप्रैल 8, 2007 at 9:15 पूर्वाह्न 1 comment


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